Friday, September 12, 2008

अब क्यूँ हर बार...

आज सफाई करते समय एक पुरानी तूलिका हाथ लगी
और लगा मैं उसके पन्ने पलटने ,
यादों को टटोलने ,
उसका हर चित्र परिपूर्ण था ,
लगा जैसे सब को एक स्पष्ट विचार,
और द्रण निश्चय से बनाया गया था
सबका उद्देश्य स्पष्ट था, द्रश्य था
हर काम शुरू करके धैर्य से पूरा किया गया था
अब मैं अपने आज को सोचता हूँ ,
हैरान होता हूँ
अपने से ही परेशान होता हूँ
कि क्या हुआ जो हर चित्र अधूरा है ,
अपूर्ण है ,
क्यूँ अब हर बार एक अच्छे विचार के बावजूद
हिम्मत हार जाती है,
मेरी नौका मझधार में डगमगा जाती है,
क्यूँ अब हर बार मैं अपने विचार को
रूप देते देते रह जाता हूँ,
क्यूँ हर बार में चित्र अधूरा छोड़कर ,
आगे बड़ जाता हूँ
एक नए विचार की खोज में ,
एक नए चित्र की खोज में
अब क्यूँ हर बार मैं पेज पलटकर आगे
बड़ जाता हूँ


2 comments:

Veeru said...

yaar i dont know about the quality(technical) but feelings are same for me now.. u put them in words..

Bhautik said...

nice thoughts finally on paper