Saturday, September 20, 2008

इंतज़ार....


लाइब्रेरी में मेरे सामने की डेस्क पर बैठी,
एक लड़की बड़े मन से पड़ने में मशगूल थी
पर बालों की एक लट ,
उसके होठों का स्पर्श करने को ,
बार-बार कान के पीछे से बाहर जाती थी ,
और वो बड़ी चपलता से उसको ,
फ़िर कान के पीछे कर देती थी
वो मस्त थी अपने काम में ,
और मैं (उसे देखने के)अपने काम में
फ़िर चली हवा से ,
कुछ बाल उसके मुँह में चले गए,
और उसने लट के नीचे से ,
अपने गालों पर हाथ फ़िराते हुए ,
बड़ी ही फुर्ती से एक ही बार में,
सब को बाहर कर दिया
में तो लगभग मुस्करा ही दिया उसकी फुर्ती से ,
फ़िर मैंने अपने आस-पास देखा कि,
किसी ने देखा तो नहीं
यह जान कर कि बाल होठों के स्पर्श के बाद ,
मतवाले हो गए हैं ,
उसने उन्हें संवार के बाँधने का सोचकर ,
बाल खोले ही थे ,
कि तभी चली हवा से बाल ,
इतना जोर से उड़े मानो,
वो बस इसी पल के इंतज़ार में थे,
और वे सब उसके गालों और होठों के स्पर्श को मचल रहे हैं,
उसने क्लिप को मुँह में पकड़ा ,
और दोनों हाथों से ,
उन मचलते बालों को डाँटते हुए पकड़ा ,
और उनको मोड़ते हुए फ़िर से क्लिप में बाँध दिया
और मैं अब भी इंतज़ार कर रहा हूँ ,
कि कब फ़िर से एक लट ,
उसकी क्लिप में से बाहर निकले ,
और वो अपने हुनर से उनको सँवारती रहे ,
और मैं उसको देखता रहूँ...एकटक !!!

Friday, September 12, 2008

अब क्यूँ हर बार...

आज सफाई करते समय एक पुरानी तूलिका हाथ लगी
और लगा मैं उसके पन्ने पलटने ,
यादों को टटोलने ,
उसका हर चित्र परिपूर्ण था ,
लगा जैसे सब को एक स्पष्ट विचार,
और द्रण निश्चय से बनाया गया था
सबका उद्देश्य स्पष्ट था, द्रश्य था
हर काम शुरू करके धैर्य से पूरा किया गया था
अब मैं अपने आज को सोचता हूँ ,
हैरान होता हूँ
अपने से ही परेशान होता हूँ
कि क्या हुआ जो हर चित्र अधूरा है ,
अपूर्ण है ,
क्यूँ अब हर बार एक अच्छे विचार के बावजूद
हिम्मत हार जाती है,
मेरी नौका मझधार में डगमगा जाती है,
क्यूँ अब हर बार मैं अपने विचार को
रूप देते देते रह जाता हूँ,
क्यूँ हर बार में चित्र अधूरा छोड़कर ,
आगे बड़ जाता हूँ
एक नए विचार की खोज में ,
एक नए चित्र की खोज में
अब क्यूँ हर बार मैं पेज पलटकर आगे
बड़ जाता हूँ